ईस्वी 1156 में रावल जैसल ने त्रिकुटा पर्वत पे जैसलमेर राज्य की स्थापना की। रावल उपाधि का मतलब है की राजघराने वाला। इसी त्रिकुटा पर्वत पे एसुल नामक साधू का निवासस्थान था। जब रावल जैसल उनसे मिलने आए तो साधू, ने उनसे उनके वंश के बारे में पूछा। रावल ने अपना नाता यदुवंश से बताया तो साधू ने विस्तार से त्रिकुटा पर्वत और उसके बारे में जुडी हुई पौराणिक कहानी बताई।
पौराणिक कहानी के अनुसार जब इस पर्वत पे श्रीकृष्ण ने भीम के सामने ये भविष्यवाणी की थी की त्रिकुटा पर्वत पे जो भी नगर बसाया जायेगा उस नगर का राजा यदुवंशी होगा। उस पौराणिक कहानी राजा को कहे जाने के पश्चात साधू ने भी एक भविष्यवाणी की जिसके मुताबिक़ यह राज्य ढाई बार बसके उजड़ जायेगा और फिर बसेगा। इस भविष्यवाणी को सुनने के पश्चात् भी राजा इसी बात पे कायम रहा की किल्ला तो इसी पर्वत पे बनाना है।
जैसलमेर पहले से ही एक महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग हुआ करता था। उत्तर भारत एवं मध्य एशिया को गुजरात के अरबी समुद्र से फिर वहां से ईरान और इजिप्त तक जोड़ता था। इसी महत्वपूर्ण जगह की वजह से हर एक गुजरते हुए काफिले के पास से टैक्स लिया जाता था। भाटी राजपूतो की जोधपुर एवं बीकानेर के राठोडो से कई बार झड़पें होती थी इसी वजह से होती थी।
उस समय ख़िलजी, जो एक तुर्क मुसलमान था, का शासन दिल्ही पे हुआ करता था। उनके पुरे काफिले पर जैसलमर से छापा मारा गया। इस खबर से तिलमिला उठे ख़िलजी ने ताबड़तोड़ सैन्य ले के जैसलमेर जाने का फैसला किया। किल्ले में भी युद्ध की पूरी सम्भावना देखते हुए जोरदार तैयारियां चल रही थी। सब बूढ़े, बच्चे और बीमार लोगो को सैन्य की देखरेख में सुरक्षित स्थान पर हटा दिया गया। किल्ले को चौतरफा सुरक्षित कर और अनाज तथा गोलाबारूद के भंडार भर के रावल जैतसिंह राह देखने लगा।
एक मान्यता अनुसार यह युद्ध आठ साल चला जिसमे रावल के सैनिको ने शत्रु की सप्लाई चैन काट दी। चडाई के दौरान रावल जैतसिंह की मौत हुई और उनका पुत्र मूलराज दूसरा गद्दी पे आसीन हुआ। ईस्वी 1294 में शत्रु को एक बड़ी सफलता तब हाथ लगी जब शत्रुओ ने किल्ले की पूरी घेराबंदी कर ली। अब धीरे धीरे किल्ले का खाना और बारूद खत्म होने लगा। भाटिओ को लगा की हार निश्चित है, तो 24000 स्त्रियों ने जौहर शूरू किया। एक चिता तैयार की और अपने आपको उसके हवाले कर दिया। जब वो चिता भी छोटी पड़ी तो बची हुई स्त्रियों ने अपने सगे सम्बधियों की तलवारो द्वारा कटना मंजूर किया। हार निश्चित थी इसलिए पुरुषो ने किल्ले के द्वार खोल दिए और दुश्मनो को जितना हो सके उतना मार के वीरगति प्राप्त की। ये था पहला जौहर।
14वि सदी में दिल्ही का राजा तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह था। जैसलमेर के युवा राजा अजमेर के पास आये आनासागर तालाब के किनारे लगाये हुए राजा के तम्बू पे छापा मारा, और उनकी कीमती घोडा ले गया। तुग़लक़ ने किल्ले पे चढ़ाई की और इस दूसरे जौहर में 16000 स्त्रियां एवं 1700 जवामर्द विरयोद्धा के साथ रावल दूदू और उनका पुत्र तिलासकी मारा गया।
आमिर अली नामक एक अफगानी सरदार था। उसने रावल लूणाकरण के विरुद्ध दांव खेला।उसे कहलवाया की आमिर अली यानि अपनी खुद की पत्नी जैसलमेर की रानी से मिलने लालायित है तो रावल ने मंजूरी दे दी। पूरी पालखी सज गयी, और पालखी जैसे ही किल्ले के दरवाजे के अंदर पहुची, दरवान भौचक्के रह गए। वो और रावल दोनों मुर्ख बने क्योंकि पालखियों में अफगानी स्त्रियों की जगह आमिर अली के अफगानी लडाकू थे। धौखे से हुए हमले में राजा चौकन्ना नहीं था, और बाजी हाथ से जा रही थी। और तो और वक़्त इतना कम था की चिताएँ भी तैयार करना नामुमकिन था। स्त्रियां दुश्मन के शिकंजे में न आये इसीलिये रावल ने अपनी तलवार म्यान में से निकाली और एक के बाद एक स्त्रियों को मारता चला गया। आश्चर्यजनक तरीके से आधा जौहर पूरा होते ही बाहर से मदद आई, और आमिर अली को पकड़ के उसे तोप के मुह के पास लटका दिया गया। बूम, एक ही धमाके ने उसके फुर्चे फुर्चे उड़ा दिए गए। ये आधा जौहर था क्योंकि जैसे ही बाहर से रावल को मदद आई वैसे ही चिता पे चढे लोगो को उतार लिया गया।
अब देखने की बात ये है की बिकानेर और जोधपुर के राठौड़ अविरत जैसलमेर के रावलो से लड़ते थे।क्या ऐसी संकटपूर्ण घडी में इन राजाओ द्वारा अपने पुराने वैर या गीले शिकवे भूल के एक दूसरे की मदद नहीं करनी चाहिए? क्या इसका दायित्व श्री छत्रपति महाराज शिवाजी और महाराणा प्रताप ने ही ले रखा है? इस लेख को लिखते वक़्त मन में उस दौर के कई राजा और इस दौर के कई राजनेताओ पे मनोमंथन करा जो अपने आप को हिन्दू सम्राट तो कहलाते है, मगर क्या कभी अपनी इसी बात पे कायम रहते है? खैर राजा गए मगर वोट की चाह वाले राजनेताओ के लिए तो आनेवाला वक़्त ही मिल का पत्थर साबित होगा की वोट के दौड़ में वो कहा तक निकल गए है।
पौराणिक कहानी के अनुसार जब इस पर्वत पे श्रीकृष्ण ने भीम के सामने ये भविष्यवाणी की थी की त्रिकुटा पर्वत पे जो भी नगर बसाया जायेगा उस नगर का राजा यदुवंशी होगा। उस पौराणिक कहानी राजा को कहे जाने के पश्चात साधू ने भी एक भविष्यवाणी की जिसके मुताबिक़ यह राज्य ढाई बार बसके उजड़ जायेगा और फिर बसेगा। इस भविष्यवाणी को सुनने के पश्चात् भी राजा इसी बात पे कायम रहा की किल्ला तो इसी पर्वत पे बनाना है।
जैसलमेर पहले से ही एक महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग हुआ करता था। उत्तर भारत एवं मध्य एशिया को गुजरात के अरबी समुद्र से फिर वहां से ईरान और इजिप्त तक जोड़ता था। इसी महत्वपूर्ण जगह की वजह से हर एक गुजरते हुए काफिले के पास से टैक्स लिया जाता था। भाटी राजपूतो की जोधपुर एवं बीकानेर के राठोडो से कई बार झड़पें होती थी इसी वजह से होती थी।
उस समय ख़िलजी, जो एक तुर्क मुसलमान था, का शासन दिल्ही पे हुआ करता था। उनके पुरे काफिले पर जैसलमर से छापा मारा गया। इस खबर से तिलमिला उठे ख़िलजी ने ताबड़तोड़ सैन्य ले के जैसलमेर जाने का फैसला किया। किल्ले में भी युद्ध की पूरी सम्भावना देखते हुए जोरदार तैयारियां चल रही थी। सब बूढ़े, बच्चे और बीमार लोगो को सैन्य की देखरेख में सुरक्षित स्थान पर हटा दिया गया। किल्ले को चौतरफा सुरक्षित कर और अनाज तथा गोलाबारूद के भंडार भर के रावल जैतसिंह राह देखने लगा।
एक मान्यता अनुसार यह युद्ध आठ साल चला जिसमे रावल के सैनिको ने शत्रु की सप्लाई चैन काट दी। चडाई के दौरान रावल जैतसिंह की मौत हुई और उनका पुत्र मूलराज दूसरा गद्दी पे आसीन हुआ। ईस्वी 1294 में शत्रु को एक बड़ी सफलता तब हाथ लगी जब शत्रुओ ने किल्ले की पूरी घेराबंदी कर ली। अब धीरे धीरे किल्ले का खाना और बारूद खत्म होने लगा। भाटिओ को लगा की हार निश्चित है, तो 24000 स्त्रियों ने जौहर शूरू किया। एक चिता तैयार की और अपने आपको उसके हवाले कर दिया। जब वो चिता भी छोटी पड़ी तो बची हुई स्त्रियों ने अपने सगे सम्बधियों की तलवारो द्वारा कटना मंजूर किया। हार निश्चित थी इसलिए पुरुषो ने किल्ले के द्वार खोल दिए और दुश्मनो को जितना हो सके उतना मार के वीरगति प्राप्त की। ये था पहला जौहर।
14वि सदी में दिल्ही का राजा तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह था। जैसलमेर के युवा राजा अजमेर के पास आये आनासागर तालाब के किनारे लगाये हुए राजा के तम्बू पे छापा मारा, और उनकी कीमती घोडा ले गया। तुग़लक़ ने किल्ले पे चढ़ाई की और इस दूसरे जौहर में 16000 स्त्रियां एवं 1700 जवामर्द विरयोद्धा के साथ रावल दूदू और उनका पुत्र तिलासकी मारा गया।
आमिर अली नामक एक अफगानी सरदार था। उसने रावल लूणाकरण के विरुद्ध दांव खेला।उसे कहलवाया की आमिर अली यानि अपनी खुद की पत्नी जैसलमेर की रानी से मिलने लालायित है तो रावल ने मंजूरी दे दी। पूरी पालखी सज गयी, और पालखी जैसे ही किल्ले के दरवाजे के अंदर पहुची, दरवान भौचक्के रह गए। वो और रावल दोनों मुर्ख बने क्योंकि पालखियों में अफगानी स्त्रियों की जगह आमिर अली के अफगानी लडाकू थे। धौखे से हुए हमले में राजा चौकन्ना नहीं था, और बाजी हाथ से जा रही थी। और तो और वक़्त इतना कम था की चिताएँ भी तैयार करना नामुमकिन था। स्त्रियां दुश्मन के शिकंजे में न आये इसीलिये रावल ने अपनी तलवार म्यान में से निकाली और एक के बाद एक स्त्रियों को मारता चला गया। आश्चर्यजनक तरीके से आधा जौहर पूरा होते ही बाहर से मदद आई, और आमिर अली को पकड़ के उसे तोप के मुह के पास लटका दिया गया। बूम, एक ही धमाके ने उसके फुर्चे फुर्चे उड़ा दिए गए। ये आधा जौहर था क्योंकि जैसे ही बाहर से रावल को मदद आई वैसे ही चिता पे चढे लोगो को उतार लिया गया।
अब देखने की बात ये है की बिकानेर और जोधपुर के राठौड़ अविरत जैसलमेर के रावलो से लड़ते थे।क्या ऐसी संकटपूर्ण घडी में इन राजाओ द्वारा अपने पुराने वैर या गीले शिकवे भूल के एक दूसरे की मदद नहीं करनी चाहिए? क्या इसका दायित्व श्री छत्रपति महाराज शिवाजी और महाराणा प्रताप ने ही ले रखा है? इस लेख को लिखते वक़्त मन में उस दौर के कई राजा और इस दौर के कई राजनेताओ पे मनोमंथन करा जो अपने आप को हिन्दू सम्राट तो कहलाते है, मगर क्या कभी अपनी इसी बात पे कायम रहते है? खैर राजा गए मगर वोट की चाह वाले राजनेताओ के लिए तो आनेवाला वक़्त ही मिल का पत्थर साबित होगा की वोट के दौड़ में वो कहा तक निकल गए है।
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