पौराणिक कथा अनुसार लंकाधिपति रावण की क्रूरता तब हद पार कर गयी जब उसने अपने यहाँ बसे हुए ऋषिमुनिओ से कर के एवज में रक्त लेना शुरू किया। इस अनाचार के बदले क्रुद्ध ऋषिमुनिओ ने उसे श्राप दिया की "जिस दिन रक्त से भरा कलश का मुह खुलेगा, है रावण उस दिन तुम्हारा विनाश होगा"। अब रावण इस श्राप से डर गया तो उसने वह कलश सीधा राजा जनक के खेत में गड़वा दिया।
एक बार जनकराजा के राज्य जनकपुर में भीसण अकाल पड़ा। ऋषिमुनियों की सलाह मानकर जनकराजा ने खेत में हल चलाया। हल सिधा कलश से जा टकराया। कलश का मुह तुरन्त खुल गया और सीताजी का आविर्भाव हुआ। इसलिए इस जगह का नाम सीतामढ़ी रखा गया है। इसके बाद की कथा तो सबको पता ही है।
जनकराजा ने खेत में हल चलाने से पहले पुत्रेष्टियज्ञ किया था। जिस स्थान पे ये यज्ञ हुआ था अभी उसको हलेश्वर के नाम से जाना जाता है। यहाँ पे अभी प्राचीन शिवमंदिर अवस्थित है। सीतामढ़ी से इसकी दुरी है 30 किलोमीटर।
जनकपुर से लौटते समय सीताजी की डोली एक वटवृक्ष के निचे रखी गयी थी। वो वटवृक्ष आज भी मौजूद है, और इस जगह को पंथपाकड़ के नाम से जाना जाता है। और भी अन्य देखने लायक जगह जैसे. सूर्यमंदिर, वैष्णवदेवी का मंदिर, और सीताउद्यान।
सीतामढ़ी से 3 किलोमीटर दूर भव्य सरोवर एवं मन्दिर है। सरोवर को जानकी जन्मकुंड और मन्दिर को जानकी जन्मभूमि कहते है। मन्दिर में सीता-राम और लक्ष्मण की प्रतिमाये है। एक मेला भी सीतानवमी के अवसर पर लगता है। सीता, राम और लक्ष्मण की प्रतिमाए यहाँ श्याम रंग की है, और मंदिर का हार चांदी से बना हुआ है।
Saturday, 26 March 2016
सीतामढ़ी एक अद्भुत जगह
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