Tuesday, 15 March 2016

मेरा पहला पत्र

शिवरात्रि जूनागढ़ में।
       

भवनाथ मंदिर का इतिहास और वहा पे स्थापित शिवलिंग काफी पुराना है। कहते है की शिवलिंग के पीछे एक तालाब बना हुआ है जिसकी  स्थापना 1880 में की गयी थी। स्कंद्पुरण में भवनाथ मंदिर की पूरी कहानी वर्णित है। शिवलिंग के ऊपर कई बारीक़  रुद्राक्ष के पारे पे दाने लगे हुए है, बारीकी से देखने पे पता चलता है की सारे दानो के ऊपर ॐ वर्णित है
          मंदिर सवर्णरेखा नदी के बिच में और मृगिकुण्ड के किनारे आया हुआ है। स्पष्ट उल्लेख नहीं है मगर मंदिर भूतकाल में अवस्य जहोजलाली से भरपूर रहा होगा। जब मंदिर का जीणोद्धार चल रहा था तब 8 या 10 फीट निचे से सुन्दर, भव्य और महीन बारीक़ कला वाले शिलालेख मिले थे। मंदिर कैसे ध्वस्त हुआ उसका भी कोई उल्लेख नहीं मिल रहा है।
          भवनाथ मंदिर के बारें में इतना लिखने का मेरा तात्पर्य जूनागढ़ के प्रसिद्द और हर साल मनाएं जानेवालें शिवरात्रि के मेले से हैं। मेले की शुरुआत महावद तेरस के दिन भवनाथ मंदिर पे धजा चढ़ा के की जाती है। विशाल जगह में ये मेला आयोजित किया जाता है, भक्ति,भोजन और भजन इसमें और रंग भर देते है।
          यहाँ का प्रमुख आकर्षण साधू संत एवं नागा साधू के जुलुस है। इस जुलुस को गुजराती में रवेडी भी कहा जाता है।  शिवरात्रि के दिन निर्धारित समय पे दसनामि पंथ के अखाड़े से साधुबाबा सबसे पहले रवेडी या जुलुस निकालते है। इनमे पहली पालखी भगवान् दतात्रेय की होती है,और बाद में कई साधू संत एवं उनके शिष्य अपनी अपनी धर्मधजा और धर्मदंड ले कें बारी बारी जुलुस में शामिल होतें है। लोगबाग का हुजूम पहले से ये देखने के लिए रास्तें के दोनों छोर पे उमट पड़ता है।
          जुलुस में कए कसरत के दावपेच, लाठिदाव,तलवार दाव और दुसरे अनेक नानाविध एवं हैरतअंगेज प्रकार के प्रयोग किये जातें है। पूरा जुलुस भवनाथ मंदिर के दुसरे दरवाजे से प्रवेश करता हुआ मृगिकुण्ड पहुचता है। नियत क्रम अनुसार नागाबाबा और साधू संत मृगीकुण्ड में स्नान करतें हे और बादमे भवनाथ मंदिर के दर्शन एवं आरती पूजा करतें है।
          भगवान भोलेनाथ की आरती के बाद पूरा वातावरण हर हर महादेव के नादो से गूंज उठता है। ऐसी भी लोकमान्यता है की अस्वस्थामा, गोपीचंद, बलिराजा, परशुराम, राजा भरथरी, विभिषण जैसे कई महापुरुष इस पवित्र दिन पे स्नानविधि के लिए मृगीकुन्ड आतें है।
          मेले का आयोजन भी बहुत ही अच्छी तरीके से किया जाता है। भंडारा के अलावा कई बसें भी मेले तक ले जाने के लिएें दौडाई जाती है। यात्रीको की सेवा के लिए चौबीसों घंटे माहिती केंद्र भी उपलब्ध भी रहता है।
          भवनाथ मंदिर-: पृथ्वी पे हुए प्रलय के बाद की सुबह में ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र तीन रूप में प्रकट हुए, सत्व, रजस् और तमसे। अब इन तीन भगवान में कौन बड़ा है इसकी बहस छीड गयी। शिवजी तब मध्यस्थि हुए और ब्रह्मा को उत्पत्ति, विष्णुजी को देखरेख और लालनपालन और रूद्र को संहार का जिम्मा सोपा। इस तरह जघड़े का अंत किया। ब्रह्माजी ने शिवजी से संसार में रहकर संसारियों के सुख दुःख मिटाने की गुजारिश की। शिवजी ने इसके लिए उचित जगह पे नज़र दौड़ाई और गिरनार को ढूंढा।
      पार्वतीजी ने देखा की शिवजी कैलाश पर्वत पे नहीं है। उन्होंने जाना की सारे देवताओ ने मिलके शिवजी को सृष्टि पे भेज है तो वह भी गिरनार आ पहुचे। उस दिन शिवजी भवनाथ रुप में थे और दिन था वैसाख सूद पूनम का। पार्वतीजी गिरनार पे अम्बिका रूप में, विष्णुजी दामोदर रूप से दामोदर कुण्ड में और अन्य देवताओंने अलग अलग रूप से गिरनार में स्थापित हुए। भवनाथ मंदिर की स्थापना का ये इतिहास है।
          मृगिकुण्ड का भी ऐसा ही इतिहास है राजा भोज जो कान्यकुब्ज के राजा थे। एक दिन उनके सेवक ने आके एक स्त्री के बारें में जानकारी दी जिनका मुख हिरन का और शरीर स्त्री का था। राजा काफी मेहनत बाद उसको महल में लाएं। कोई भी विद्धवान इस पहेली का उकेल नहीं ला पाए तो राजा भोज उध्वरेता नामक ऋषि के पास गएं।
            उध्वरेता ऋषि ने मृगमुखी को वाचा दी। तब मृगमुखी ने अपने अगले जन्म की कहानी बताई। उसके मुताबिक़ मृगमुखी हिरन थी और राजा भोज  शेर (लायन) थे। राजा ने हिरन यानि मृगमुखी का शिकार किया तब भागते वक़्त उसका मस्तक जाडी में फस गया।
          बाकि का शरीर सुवर्णनदी में गिरा। नदी के पवित्र पानी में गिरने से मृग ने मानवशरीर धारण किया मगर मुख जाडी में फसे हुए होने की वजह से हिरणी का ही रहा। राजा भोज ने जाडी में से खोपरी या मुख ढूंढ़ निकाला और वापिस  सुवर्णनदी में प्रवाहित किया। नदी के पवित्र पानी में प्रवाहित करते ही मृगमुखी का पूरा शरीर औरत का बन गया।
          राजा भोज ने बाद में उसके साथ विवाह किया और रेवताचल (गिरनार)  में एक कुण्ड बनाया। इसी कुण्ड को  आज मृगिकुण्ड कहते है। इसी कुण्ड में शिवरात्रि के दिन साधू स्नान के लिए आते है।

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