7 दीवाली में कहा जाना है इसकी चर्चा चल रही थी। कई ने एक मत से आवाज़ दी केरल। मगर जब ट्रेन रिजर्वेशन देखा तो होश उड़ गए। सारी ट्रेन फूल। 1स्ट एन्ड 2ण्ड क्लास ac की सभी सीट रिज़र्व। अब जब तक ट्रेन का न हो तब तक होटल बूकिंग भी नहीं कर सकते। तो असमंजस में केरल की ट्रिप मुमकिन नहीं लगी। अब रुख किया राजस्थान। राजस्थान हमेशा से मेरी फेवरेट जगह रही है। शांत, रंगीला और मोस्ट इम्पॉर्टेन्टली ऐतहासिक चीजो से भरपूर।
तो मेक माय ट्रिप से होटल और टेंट बुक करके सुबह सुबह हमने अहमदाबाद छोड़ा। अहमदाबाद से तीन रास्ते जाते है।
1) Ahmedabad - Mahesana - Palanpur - Disa -Tharad - Sanchor - Barmer - Jaisalmer.
2) Mehsana - Palanpur - Sirohi - Pali - Jodhpur - Jaisalmer
3) Ahmedabad - Chandkheda - Kalol - Nundasan - Bhandu - Patan - Wagdod - Disa - Dhanera - Sanchore - Gandhav - Rohla - Barmer - Shiv - Khoral - Vinjurai - Devikot - Jaisalmer
हम गए इस रास्ते से
Deesa-Dhanera-Sanchor 76km और आये इस रास्ते से Deesa-Tharad-Sanchor 106km
बिच में चाय नास्ता करके फिर निकल पड़े। अब गुजरात का आखरी शहर क्रॉस करके हमने राजस्थान की बॉर्डर में प्रवेश कीया। रोड तो गुजरात और राजस्थान के हमेशा से बढ़िया रहे है। खाना खाने के लिए हमने बारमेर शहर को चुना। बारमेर में होटल है "गुडहॉल" करके, जिसका जिक्र नेट पे पढ़ा था और रिव्यु भी अच्छा था तो हमने कार यहाँ पे रोकी और खाने गये। खाना सचमुच काफी लजीजदार था। सर्विस भी अच्छी थी। होटल चारो साइड से खुला है। केस काउंटर के पास एक बड़ा रूम है जो हैंडीक्राफ्ट और अन्य चीज़ों की बिक्री के लिए रखा गया है। खाना खाके हमने रुख किया फिर से अपने गंतव्य की और। रोड एकदम स्ट्रैट है। थोड़ी दुरी काटने के बाद विंडमिल्स की शुरुआत होती है। बड़े बडें हाथ फैलाएं हुए पंखे विंडमिल के ऊपर लगे हुए है। ऐसा लगता है की मानो "पधारो म्हारा देश" के नाम को सार्थक कर रहे हो। जैसे ही आप जैसलमेर में प्रवेश करते हो बाइकर्स आप के इर्दगिर्द मंडराने लगते है। ये आपको होटल्स के लिए ललचाते है। मगर हमारी होटल्स तो बुक थी सो कितनी ही बार ना बोल के छुट्कारा पाया।
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| waiting for the delicious meal |
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| Hotel Godall |
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We take lunch on this place
hotel godall |
हमारी होटल एकदम किले के सामने थी। किल्ले का दर्शन सीधे रूम की खिड़की से होते थेा। रोड का काम चलने की बदौलत धूल बहुत थी। पहली रात तो हमने होटल में ही डिनर लिया, जो की होटल की ऊपर छत पर बना हुआ था। दूसरे दिन हमने हमारी घुमक्कडी शुरू की। एक बात और में आपसे कहना चाहूँगा, की जैसलमेर में अगर आपको घूमना है तो रिक्शा नजदीकी जगहों के लिए बेस्ट आप्शन है। 10 रुपय में रिक्क्षा हमें किल्ले के गेट के पास ले गया। वहा से हमने 150 रुपए में सरकारी गाइड किया।
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| Emboss on the wall of the hotel |
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| view from my hotel |
इतिहास-: जैसलमेर के असली निवासी या यूंह कहे की शहर की स्थापना भाटी जाती के राजपूतो ने की है। स्थापना साल था
1156 और भाटी वंश के जयतसिंहा से जैसलमेर की वंशावली शुरू होती है। हालांकि भाटी राजपूत अपनी वंशावली क्रिष्ण से बताते है। देओराज करके 9वि सदी में एक फेमस राजा हुआ जिससे रावल उपाधि की शुरुआत हुई। रावल यानि "राज घराने वाला"।शुरू में जैसलमेर एक ट्रेड रूट हुआ करता था। बीकानेर और जोधपुर की नजर हमेशा इस ट्रेड रूट पे गड़ी रहती थी। तो आयेदिन बीकानेर और जोधपुर की लड़ाइयां जैसलमेर से हुआ करती थी। अहम ट्रेड रूट होने की वजह से टैक्स भी लिया जाता था। हलाकि वो जैसलमेर की आवक का एक स्रोत भी तो था। तब अल्लाउदीन ख़िलजी दिल्ली पे शासन करता था। हुआ यूँ की पूरा काफ्ला जो जैसलमेर के रास्ते दिल्ली जा रहा था, उन्हें भाटी राजपूतो ने छापा मार। जैसे ही ख़िलजी को इस बात की खबर
लगी उसने जैसलमेर के ऊपर चढाई की। युद्ध पुरे नौ साल चला और जैसलमेर के लोगो ने ख़िलजी की विशाल सेना के सामने डटकर लोहा लिया। युद्ध में टिकना जब मुश्किल लगने लगा तो अपने आपको जलती हुई चिता में डालके स्त्रियों ने जौहर शुरू किया। तो पुरुषोने विशाल सैन्य के सामने लड़के अपनी प्राण की आहुति दी। इस लड़ाई में काफी जानें गयी। पुरे जैसलमेर के इतिहास में ऐसे
ढाई जौहर हुए थे, उनमे से ये पहला।था।
कई ऐसे राजा भी आये जिन्होंने मुग़ल से सुलह भी की और अच्छे पदों के ऊपर आसीन भी रहे। जाहिर है ये सब चाटुकारी से ही हुआ। इसमें से एक था साब्ला सिन्हा। यह शाहजहाँ के संरक्षण में
था और उसके पेशावर अभियान में भी शामिल था। साब्ला पेशावर में जवामर्दि से लड़ा। इसके एवज में शाहजहाँ ने उसे जैसलमेर का राजा घोषीत किया। सच्चाई तो ये थी की इस गद्दी का असली वारिशदार कोई और था। हालांकि साब्ला सिन्हा ने जोधपुर और बीकानेर जित के जैसलमेर की सिमा को मजबूत किया। असल में तो साब्ला के मुघलो सेे नजदीक सम्बन्धो के चलते ये हो सका। यहाँ इसका भी जिक्र जरुरी है की किसी मुघल राजा ने अपनी बेटी कोई हिन्दू राजा को दी हो ऐसा सुनने में नही आया। जैसलमेर में जैन धर्म का प्रसार खूब हुआ। किल्ले में भी कई जैन मंदिर ऐसे है जिनके प्रवेशदार हिन्दू देवी देवताओ की आकर्षक नक्काशीभरी कारीगरी से भरे हुए है।
ज्योही मुम्बई शहर व्यापारी बन्दर के लिए विकसित हुआ, त्योंही जैसलमेर की महत्ता कम होती गयी। विभाजन के बाद तो ये अन्तराष्ट्रीय बॉर्डर में तब्दील हो गया।
1965 और
1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध जैसलमेर की महत्ता और बढ़ गयी। एक और समस्या थी पानी की किल्लत की, तो वो भी इंदिरा गांधी केनाल ने हल करदी।
जैसलमेर किल्ला:- पूरा किल्ला तीन परतो में लिपटा हुआ है। किल्ले की स्थापना त्रिकुटी हिल पे की गयी है। प्रवेशदार बहुत बड़ा है। किल्ले के अंदर दुकाने, घर रेस्टोरेंट, बुकस्टाल और ब्यूटी पारलर भी मौजूद है। किल्ले के बिच चौगान पे महाराजा का सात मंजिला महल है, जो अभी म्यूजियम में तब्दील हो चूका है। यहां आप दीवाने खास, जो की महल के पूर्व बाजु है यह इतना ऊपर है की यहाँ से पूरा शहर का नजारा दीखता है, को देख सकते हो| ऊपर की तरफ दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बड़े पत्थर का जत्था लगा हुआ हैै। तो दीवाने आम पूरा पोर्सलीन टाइल्स से बनाया गया है।
जैन मंदिर:-श्री रुषभदेवजी, श्री चन्द्रप्रभुजी, श्री पाश्र्वनाथजी, श्री शान्तिनाथजी, श्री संभावनाथजी और श्री कुन्तुनाथजी ये सब जैन तीर्थंकर है जिनके मंदिर किल्ले के अंदर आये हुए है। श्री चंद्रप्रभुजी का मन्दिर
1509 ईस्वी में बनाया गया था। बनाने में कोई सीमेंट या रैत का इस्तेमाल नही हुआ है बलकी लोहे के इस्तेमाल से ब्लाक को जोड़ा गया है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रीचंद्रप्रभुजी की चार कृतियां रखी गयी है। यहाँ पे मूर्तियों के मण्डप देखने लायक है। श्री शितलनाथजी का मन्दिर दरवाजे के दक्षिणी छोर पे है। आठ कीमती धातुओ से इस मन्दिर की स्थापना की गयी है। यहाँ से सिडीयाँ सीधी ज्ञानभन्डार को जाती है। इसकी स्थापना
1500 ईस्वी में आचार्य महाराज जिन भद्रसूरिजी ने की थी। ये भूमिगत भाग में कीमती पांडुलिपियां, ज्योतिषी नक़्शे रखे हुए है। कई सारे कीमती पत्थर और हाथी दांत से बनी श्री पार्श्वनाथजी की मूर्ति रखी गयी है। कई जैन साधुओं की पवित्र चीज़े रखी गयी है
पुस्तकालय के निचे श्री शान्तिनाथजी और श्री कुंथु नाथजी के मन्दिर आये हुए है। दोनों की कलाकारिगरि अद्भुत है। संलग्न गैलेरी जो श्री शान्तिनाथजी के इर्दगिर्द आई हुई है वहां कई सारे साधुओकी मूर्तियां रखी हुई है। ये मुर्तिया मार्बल और जैसलमेर सैंडस्टोन दोनों से बनी है। बाद में किल्ले के मध्य में लक्ष्मीनाथ और सूर्य मन्दिर आये हुए है।
हवेलीयां:- जैसमलेर के जैन व्यपरिओने इनकी स्थापना की। शेखावाती हवेली के अलावा इतनी अदभुत कारीगरी आपको कही देखने को नहीं मिलेगी। इसमें पहली है कोठारी पटवों की हवेली। ये पांच विभागों में विभाजित है। इसका निर्माण
1800 से
1860 ईसवी के बीच पांच जैन भाइयों ने किया था। इन पांचो मे कोठारिस पटवों की
हवेली के नाम से।म्यूजियम बना हुआ है। म्यूजियम में पगड़ियाँ, घर का सामान, पुराना टेलीफोन और ग्रामोफ़ोन जैसी अनेक चीज़े यहाँ रखी गयी है। अब ये म्यूजियम वाला भाग मुम्बई स्थित कोठारीओ ने ले लिया है।
सलिमसिंग की हवेली:- एक क्रूर मंत्री के रूप में विख्यात यह हवेली खुद सलिमसिंग की है। इनका निर्माण 1815 में हुआ था। यह कलकारिगिरि का अदभुत नगीना है। निचे से एकदम संकरी मगर ऊपर जाते ही एक अचंभित टर्न ले के छत wider होती जाती है।मेंहैहवेली की रचना लोहे द्वारा पत्थरो को जोड़ा गया है। इसमें सीमेंट का उपयोग ज़रा भी नही
हुआ। इस हवेली की हर एक बालकनी (38) में अलग अलग निर्मित है।
हवेली और सलीम सिंग की कहानी में विरोधाभास है। सलीम सिंग राजा का मंत्री हुआ करता था। कुलधारा गाऊ सलीम सिंग की बदौलत ही खाली हुआ। उसने पालीवाल जाती पर जरूरत से ज्यादा कर लगाया उनको लूटा गया। यह मंत्री किसीको नही छोड़ता था, और शाहूकार के कर द्वारा सब को अपनी ज़ंजीरो में जकड़ लेता था। गाऊवालो की शिकायतों को भी उनसुना कर दिया। तो तंग आकर गाउवालो ने पलायन शुरू किया। इसमें से एक गाऊ कुलधारा भी था। कहते है की 84 गाऊ निर्वासित हुए। जब सलिम सिंग की क्रूरता तमाम हद पार कर गयी, तो जैसे को तैसा उसी न्याय से सलीम सिंग की हत्या कर दी गई।
नथमल की हवेली:- इस हवेली का निर्माण 19मी सदी के आखिर में हुआ था। इसके पहले माले पे 1.5 गोल्ड से बने चित्र रखे हुए है। हवेली के दोनों साइड दो भाईओने हाथु और लालु ने अपनी कारीगरी दिखाई है। ख़ास बात ये है की दोनों साइड एक दूसरे जैसी लगती है मगर एक जैसी है नहीँ।
गड़ी सागर- गड़ी सागर एक
हौज है, जो शहर को पानी सप्लाई करता था। इसकी स्थापना ईस्वी
1367 में महाराजा गड़ी सिंग ने की थी। एक जमाने मे यह जैसलमेर का एक मात्र जलस्त्रोत था। यहा धामधुम से गणगौर त्योहार मनाया जाता है।