Wednesday, 17 October 2018

Toad Rock

Many people believe that the rock is named after the famous person Colonel James Todd. He was famous for his extensive journey in the Western India. Actually the name was derived because of its resemblance with the toad shape.
The site is situated near the Mount Abu's famous Nakki Lake.

This site is  also perfect as a short trek route. When one reach at the top of the rock, they are the part of the magnificent panoramic view of Rajasthan's only hill station, Mount Abu.
Besides Toad Rock, there are other rock also, such as Camel Rock, Nandi Rock and Nan Rock. A cave where Swami Vivekananda was mediated for some time also situated on the trek route. This trek was not suitable for the old person as it has no steps and one has to cross the  rocky and rugged path to reach to Toad Rock.
Shamelessly the beauty of the path was destroyed by the people who are visited here. Empty water bottles, waffer packets, or littering almost destroying the beauty of the Abu's famous spot, Toad Rock.

Saturday, 20 August 2016

तनोट माता टेम्पल, शत शत नमन

राजस्थान का जैसलमेर जिल्ला पाकिस्तान बॉर्डर की नजदीक होने की वजह से सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण चौकियों में से एक है। जैसलमेर के भाटी राजपूत तणुराव ने तनोट को अपनी राजधानी सम्वत 828 तनोटराय की मूर्ति स्थापित करक बनाया। बाद के भाटी राजपूतो ने अपनी राजधानी जैसलमेर में स्थापित की, पर मंदिर तो तनोट में ही रहा।
मामड़िया नामक एक चारण निसंतान था, और संतान प्राप्ति के लिए उनहोंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की। माता चारण के स्वपन में आई और इच्छा पूछी। माता उनके यहाँ जन्म ले ऐसी इच्छा चारण ने जताई।
      माता की कृपा से चारण के यहाँ सात पुत्री और एक पुत्र हुआ। उन्ही सात पुत्रीओ में से,  विक्रम संवत 808 में, पुत्री आवड ने चारण के वहा जन्म लिया। सातों पुत्रियां दैवीय चमत्कारो से युक्त थी। हूणों से इन्होंने ही माड़ प्रदेश की रक्षा की। राजपूतो का राज्य माताजी की कृपा से सुदृढ़ हो गया तो राजा तणुराव भाटी ने इसे अपनी राजधानी बनाया।  विक्रम संवत 828 में आवड माता अपने भौतिक शरीर के साथ यहाँ स्थापित हुए। विक्रम संवत 999 में सात बहनो ने महत्वपूर्ण व्यक्ति और माड़ प्रदेश के अन्य लोगो से कहा की हमारा अवतार लेने का उदेश्य पूरा हुआ है। उसके बाद सभी बहने पश्चिम में हिंगलाज माता की और देखते हुए अदृश्य हो गई।
तनोट सामरिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है। सन् 1965 में यह क्षेत्र तीनो क्षेत्रो से घिर चूका था। एक बार शत्रु का कब्जा तनोट पे होते ही रामगढ़ से शाहगढ़ का पूरा क्षेत्र उनके हाथो में आ जाता। तनोट पर भारी बमबारी 17 और 19 नवंबर को हुई। बमबारी के साथ साथ तोप के गोले भी दागे गए। ऐसे में 13वि ग्रेनेडियर्स के मेजर जयसिंह और सिमा सुरक्षा बल की दो कंपनियो के हाथो कमान सोंपी गई।
घंटाली माता के मंदिर के पास शत्रु ने एंटी पर्सनल और एंटी टैंक माइंस लगाकर तनोट जानेवाली सप्लाई को रोक दिया। शत्रु के भरी गोलाबारी और बमबारी के बावजूद (लगभग कुल 3000 बम, और अकेले मंदिर को निशाना बनाया 450 गोलों ने) एक  भी गोला मन्दिर को निशाना नहीं बना सका। सभी गोले मंदिर के आसपास गिर गए और फूटे तक नहीं। इस याद में मन्दिर मंदिर के परिसर में एक छोटा सा म्यूजियम भी है जिसमे पाकिस्तानी सेना द्वारा फैके गए बम है जो फूटे नहीं। इस बनाव ने हमारे जवानो की हिम्मत और बढ़ाई। कम संख्या में होने के बावजूद सैनिको ने पुरे दम से शत्रुओं को भागने पर मजबूर किया।
सन् 1971 की 4थी दिसंबर की रात को BSF और पंजाब रेजिमेंट की एक कंपनी ने विश्व की महान लड़ाइयो में से एक लोंगेवाला की लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी टैंको को नेस्तोनाबूद कर दिया, और मंजर ऐसा था जैसे पाकिस्तानी टैंकों की वहा कब्रे खोद दी हो। माँ के आशीर्वाद और जवानो की हिम्मत से ये सब मुमकिन हुआ।
पहले माता की पूजा साकल दीपी ब्राह्मण किया करते थे, 1965 से माता की पूजा BSF द्वारा नियुक्त पुजारी करते है और मन्दिर का प्रबंधन BSF रेजिमेंट के ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। लोंगेवाला की विजय के बाद तनोटराय के परीसर में एक विजयस्तम्भ का निर्माण हुआ है, जहा हर साल 16 दिसंबर को वीर सैनिको की याद में उत्सव मनाया जाता है। हर साल आश्विन और चैत्र नवरात्र में यहां विशाल मैले का भी आयोजन होता है।
DISTANCE
जैसलमेर- 80 किलोमीटर- रामगढ़
रामगढ़- 40 किलोमीटर- तनोट
तनोट- 15किलोमीटर- BP609
तनोट- 38किलोमीटर- लोंगेवाला
लोंगेवाला- 45किलोमीटर- रामगढ़
रामगढ़- 80किलोमीटर- जैसलमेर।
ये तब की बात है जब हैं जैसलमेर की मेँन चेकपोस्ट पे थे। दरअसल हमें परमिशन वहा जाने की बमुश्किल मिली। हमरा ड्राईवर लोकल बाशिंदा था। और सबसे बॉर्डर पर हमारे जवानो से मिलते समय कहा कट गया पता नहीं चला। उनके मैं ऑफिसर से भी मिले जिन्होंने बड़े आदर सत्कार के साथ चाय नाश्ते का पूछा और थोड़े डिस्कशन के बाद हमने वहा से टेंट पर जाने के लिए प्रस्थान किया। अब रात के 8 बज चुके थे, और बोडर् से लेके टेंट का इलाका एकदम सुमशां। लगभग डिस्टस था,

Friday, 20 May 2016

सूर्य मंदिर मोढेरा


मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर
अहमदाबाद से मेहसाना काम के सिलसिले में जाना हुआ। वैसे ग्रुप से ही मुझे घुमक्कडी का चसका लगा है, तो भाई के सामने ये शर्त रखी की वहा से मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर देखना ही देखना है। थोड़ी आनाकानी के बाद ये शर्त भी मंजूर हुई। जहा पे जाना था वहा से मन्दिर की दुरी 25 km है, पर रास्ता बहोत ही बढ़िया है। दोनों साइड वृक्षो से आच्छादित रोड इस चिलचिलाती धुप में शुकुन देते है। दोपहर को 3 बजे 46 डिग्री की धुप में हम सूर्यमन्दिर के दर्शन करने पहुचें। वापिस आने में दैर होने ही होनी थी इसलिए मंदिर की प्रदक्षिणा हमने (मैंने और मेरे कज़िन ने) 15 मिनट में पूरी की। इसी कस्मोकश में म्यूजियम देखना छुट गया।
अब गाथा सूर्यमन्दिर की,
सोलंकियुग गुजरात के इतिहास का सुवर्णयुग कहलाता है। सांस्कृतिक विरासत, स्थापत्यकला, जाजरमान प्रतिभा सब इसी युग में स्थापित हुई। अंहिलपुर पाटन के सोलंकी राजवी भीमदेव पहले के समय में ख्यातनाम सूर्यमन्दिर मोढ़ेरा का निर्माण इ.स. 1027 में शुरू हुआ। यह मंदिर गुजरात में मेहसाना जिले के चानस्मा तालुका के मोढ़ेरा गाऊ में आया हुआ है।
सूर्यपूजा भारतभर में सालो से चली आ रही अविरत प्रक्रिया है। यूँ कहे की ये जीवन का अभिन्न अंग है। यह हमारी प्रकृति के साथ प्रेम की अभिव्यक्ति है। इसी सूर्यपूजा के साथ साथ सूर्यमूर्ति और सूर्यमन्दिर के निर्माण की प्रणाली भी अस्तित्व में आयी। ईरान के शक लोगों ने सौराष्ट्र पे हमला किया। शक लोग सूर्य और अग्निपूजक थे तो हो सकता है की इन्होंने ही भारत में सूर्य और अग्नि की पूजा शूरू करवाई हो। वल्लभी वंश के कई राजा ने सूर्यधर्म को राजधर्म घोषित किया था। उसी समय कई लकड़ी के सूर्यमन्दिर बने थे पर समय के सामने ये लकड़ी के मंदिर टिक न सके।
सूर्यपूजा का सम्बन्ध इस पुराणकथा से जुडा हुआ है। हुआ युं की संज्ञा, जो भगवान विश्वकर्मा की बेटी थी, उनका विवाह सूर्य के साथ तय हुआ। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर सकी और वो वापिस अपने घर आ गयी। इसी बात पे भगवान विश्वकर्मा ने उन्हें डांट लगायी, और कहा की यह भूल अक्षम्य है। संज्ञा को आदेश दिया की तुम्हे धर्मारण्य जा के तप करना पड़ेगा। संज्ञा की तप की शुरुआत के साथ एक अध्याय का अंत होता है।
दूसरे अध्याय में सूर्य अपना जीवन छाया के साथ शूरू करते है। एक दिन भगवान विश्वकर्मा से मिलने सूर्य उनके घर जाते है। तभी उन्हें संज्ञा के बारें में ज्ञात होता है। सूर्य तुरंत संज्ञा से मिलने घोड़े का रूप लेके धर्मारण्य पहुचते है, तो संज्ञा भी उन्हें देख के तुरंत पहचान जाती है। अब तप के प्रभाव से संज्ञा ने भी घोड़ी का स्वरुप ले लिया, और इसी धर्मारण्य में दोनों बरसो तक रहें। यहां उन्हें तीन संतानो, यमधर्म, यमुनाजी, और अश्विनी कुमार, की प्राप्ति हुई। बाद में इसी जगह (जिस जगह संज्ञा और सूर्यजी रहे) सूर्यमंदिर की स्थापना हुई।
राजा भीमदेव ने पुराने लकड़ी के मन्दिर की जगह नया और वर्तमान इतिहासप्रसिद्द मोढ़ेरा के सूर्यमन्दिर का निर्माण किया। जानके आश्चर्य होगा पर ये बात सही है की कोणार्क का भव्य सूर्यमन्दिर मोढ़ेरा के सूर्यमन्दिर के लगभग ढाइसो से तीनसो साल बाद बना। हाँ, कलाकारिगरी और डिज़ाइन के मामले में दोनों एकदम अलग है।




मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर 51 फुट और 9 इंच लम्बाइ तथा 25 फुट और 8 इंच चौड़ाई में फेला हुआ है। इस मन्दिर को तीन भागो में बांटा गया है, जो निम्नलिखित है। 1 गर्भगृह, 2 अंतराल, 3 सभामण्डप। मन्दिर के आगे एक बड़ा सा कुण्ड है, जिसे रामकुण्ड या सूर्यकुण्ड भी कहते है। इस कुण्ड में उतरते समय कई छोटे छोटे मन्दिर, जिनकी संख्या 108 है, आये हुए है।
इसी छोटे छोटे मन्दिरों में वैष्णव मूर्ति की तादाद ज्यादा है। कुण्ड के पूर्व बाजु और मुख्य मन्दिर के सामने शेषशायी विष्णु की मूर्ति है। दूसरी मुर्तिया में वामन अवतार, शितलादेवी और कमलआसन पर बेठे हुए लक्ष्मीजी की मुर्तिया है। ऐसा कहा जाता है की सूर्य के घोड़े द्वारा खुजाने से ये कुण्ड अस्तित्व में आये है।
सूर्यमन्दिर एक ऊँचे आसन पे बिराजमान है। उत्तर तरफ की दीवार में एक बड़ी सी मूर्ति रखी हुई है। इस मूर्ति के तीन मुख तीन पैर और तीन हाथ है। गाऊ के लोग इसे कालभैरव कहते है और हर सप्ताह तैल और सिंदूर का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। मूर्ति के आगे नंदी शिव के साथ खड़े है।
सूर्यमन्दिर का मुख पूर्व दिशा में है, इसलिए वसन्त और शरद ऋतु में सूरज की किरने पुरे सभा मण्डप को पार करके गर्भगृह में गिरती है, जिससे सभामण्डप की मुर्तिया, खम्भे सब एक साथ देदीप्यमान होते है। ई.स. 1809 में सर्वेयर जनरल मोनियर विलियम ने जब यह मन्दिर पहली बार देखा तो वो अचंभित रह गए थे। मोढ़ेरा गाऊ सूर्यमन्दिर एवं प्राचीन मातंगी मन्दिर के लिए भी प्रसिद्द है। लोकहृदय में मातंगी मन्दिर मोढेश्वरी माता के नाम से भी प्रसिद्ध है।



कैसे पहुचा जाए।
1. अहमदाबाद से मेहसाना और मोढ़ेरा के लिए स्पेशल बसें जाती है। आप को अहमदाबाद से शेयर टैक्सी भी मिल जायेगी, या तो फिर शेयर जीप भी। हालांकि जीप में आदमी बहुत भरे जाते है।
2. खाने पिने के लिए मन्दिर के पास ही तोरण करके eateries की शॉप है जहाँ से आपको mrp प्राइस पे ही कोल्ड ड्रिंक्स एवं नास्ते मिल जायेंगे। शायद पास ही में तोरण गेस्ट हाउस भी है। दोनों गवर्नमेंट की देखरेख में चलते है।
3. सूर्यमन्दिर के लिए एंट्री टिकट 15 RS है।
4. अगर हो सके तो ठण्ड की ऋतु में जाए। अगर भूल से भी समर में निकले हो तो यहां शाम को आना पसंद कीजिये। मंदिर के आगे लॉन एकदम व्यवस्थित है, और पिकनिक के लिए उत्तम जगह है।
5. हर साल के फेब्रुअरी महीने में यहां नृत्य महोत्सव का आयोजन गुजरात सरकार द्वारा किया जाता है। देश के दिग्गज नृत्यकार यहाँ भाग लेने आते है।


Tuesday, 26 April 2016

जैसलमेर सोने की नगरी

     7 दीवाली में कहा जाना है इसकी चर्चा चल रही थी। कई ने एक मत से आवाज़ दी केरल। मगर जब ट्रेन रिजर्वेशन देखा तो होश उड़ गए। सारी ट्रेन फूल। 1स्ट एन्ड 2ण्ड क्लास ac की सभी सीट रिज़र्व। अब जब तक ट्रेन का न हो तब तक होटल बूकिंग भी नहीं कर सकते। तो असमंजस में केरल की ट्रिप मुमकिन नहीं लगी। अब रुख किया राजस्थान। राजस्थान हमेशा से मेरी फेवरेट जगह रही है। शांत, रंगीला और मोस्ट इम्पॉर्टेन्टली ऐतहासिक चीजो से भरपूर।
     तो मेक माय ट्रिप से होटल और टेंट बुक करके सुबह सुबह हमने अहमदाबाद छोड़ा। अहमदाबाद से तीन  रास्ते जाते है।
1) Ahmedabad - Mahesana - Palanpur - Disa -Tharad - Sanchor - Barmer - Jaisalmer.
2) Mehsana - Palanpur - Sirohi - Pali - Jodhpur - Jaisalmer
3) Ahmedabad - Chandkheda - Kalol - Nundasan - Bhandu - Patan - Wagdod - Disa - Dhanera - Sanchore - Gandhav - Rohla - Barmer - Shiv - Khoral - Vinjurai - Devikot - Jaisalmer
हम गए इस रास्ते से
Deesa-Dhanera-Sanchor 76km और आये इस रास्ते से Deesa-Tharad-Sanchor 106km
     बिच में चाय नास्ता करके फिर निकल पड़े। अब गुजरात का आखरी शहर क्रॉस करके हमने राजस्थान की बॉर्डर में प्रवेश कीया। रोड तो गुजरात और राजस्थान के हमेशा से बढ़िया रहे है। खाना खाने के लिए हमने बारमेर शहर को चुना। बारमेर में होटल है "गुडहॉल" करके, जिसका जिक्र नेट पे पढ़ा था और रिव्यु भी अच्छा था तो हमने कार यहाँ पे रोकी और खाने गये। खाना सचमुच काफी लजीजदार था। सर्विस भी अच्छी थी। होटल चारो साइड से खुला है। केस काउंटर के पास एक बड़ा रूम है जो हैंडीक्राफ्ट और अन्य चीज़ों की बिक्री के लिए रखा गया है।  खाना खाके हमने रुख किया फिर से अपने गंतव्य की और।  रोड एकदम स्ट्रैट है। थोड़ी दुरी काटने के बाद विंडमिल्स की शुरुआत होती है। बड़े बडें हाथ फैलाएं हुए पंखे विंडमिल के ऊपर लगे हुए है। ऐसा लगता है की मानो "पधारो म्हारा देश" के नाम को सार्थक कर रहे हो। जैसे ही आप जैसलमेर में प्रवेश करते हो बाइकर्स आप के इर्दगिर्द मंडराने लगते है। ये आपको होटल्स के लिए ललचाते है। मगर हमारी होटल्स तो बुक थी सो कितनी ही बार ना बोल के छुट्कारा पाया।
waiting for the delicious meal

Hotel Godall

We take lunch on this place
hotel godall 


      हमारी होटल एकदम किले के सामने थी। किल्ले का दर्शन सीधे रूम की खिड़की से होते थेा। रोड का काम चलने की बदौलत धूल बहुत थी। पहली रात तो हमने होटल में ही डिनर लिया, जो की होटल की ऊपर छत पर बना हुआ था। दूसरे दिन हमने हमारी घुमक्कडी शुरू की। एक बात और में आपसे कहना चाहूँगा, की जैसलमेर में अगर आपको घूमना है तो रिक्शा नजदीकी जगहों के लिए बेस्ट आप्शन है। 10 रुपय में रिक्क्षा हमें किल्ले के गेट के पास ले गया। वहा से हमने 150 रुपए में सरकारी गाइड किया।
Emboss on the wall of the hotel





view from my hotel




     इतिहास-: जैसलमेर के असली निवासी या यूंह कहे की शहर की स्थापना भाटी जाती के राजपूतो ने की है। स्थापना साल था 1156 और भाटी वंश के जयतसिंहा से जैसलमेर की वंशावली शुरू होती है। हालांकि भाटी राजपूत अपनी वंशावली क्रिष्ण से बताते है।  देओराज करके 9वि सदी में एक फेमस राजा हुआ जिससे रावल उपाधि की शुरुआत हुई। रावल यानि "राज घराने वाला"।शुरू में जैसलमेर एक ट्रेड रूट हुआ करता था। बीकानेर और जोधपुर की नजर हमेशा इस ट्रेड रूट पे गड़ी रहती थी। तो आयेदिन बीकानेर और जोधपुर की लड़ाइयां जैसलमेर से हुआ करती थी। अहम ट्रेड रूट होने की वजह से टैक्स भी लिया जाता था। हलाकि वो जैसलमेर की आवक का एक स्रोत भी तो था। तब अल्लाउदीन ख़िलजी दिल्ली पे शासन करता था। हुआ यूँ की पूरा काफ्ला जो जैसलमेर के रास्ते दिल्ली जा रहा था, उन्हें भाटी राजपूतो ने छापा मार। जैसे ही ख़िलजी को इस बात की खबर लगी उसने जैसलमेर के ऊपर चढाई की। युद्ध पुरे नौ साल चला और जैसलमेर के लोगो ने ख़िलजी की विशाल सेना के सामने डटकर लोहा लिया। युद्ध में टिकना जब मुश्किल लगने लगा तो अपने आपको जलती हुई चिता में डालके स्त्रियों ने जौहर शुरू किया। तो पुरुषोने विशाल सैन्य के सामने लड़के अपनी प्राण की आहुति दी। इस लड़ाई में  काफी जानें गयी। पुरे जैसलमेर के इतिहास में ऐसे ढाई जौहर हुए थे, उनमे से ये पहला।था।
     कई ऐसे राजा भी आये जिन्होंने मुग़ल से सुलह भी की और अच्छे पदों के ऊपर आसीन भी रहे। जाहिर है ये सब चाटुकारी से ही हुआ। इसमें से एक था साब्ला सिन्हा। यह शाहजहाँ के  संरक्षण में था और उसके पेशावर अभियान में भी शामिल था। साब्ला पेशावर में जवामर्दि से लड़ा। इसके एवज में शाहजहाँ ने उसे जैसलमेर का राजा घोषीत किया। सच्चाई तो ये थी की इस गद्दी का असली वारिशदार कोई और था। हालांकि साब्ला सिन्हा ने जोधपुर और बीकानेर जित के जैसलमेर की सिमा को मजबूत किया। असल में तो साब्ला के  मुघलो सेे नजदीक सम्बन्धो के चलते ये हो सका। यहाँ इसका भी जिक्र जरुरी है की किसी मुघल राजा ने  अपनी बेटी कोई हिन्दू राजा को दी हो ऐसा सुनने में नही आया। जैसलमेर में जैन धर्म का प्रसार खूब हुआ। किल्ले में भी कई जैन मंदिर ऐसे है जिनके प्रवेशदार हिन्दू देवी देवताओ की आकर्षक नक्काशीभरी कारीगरी से भरे हुए है। 
     ज्योही मुम्बई शहर व्यापारी बन्दर के लिए विकसित हुआ, त्योंही जैसलमेर की महत्ता कम होती गयी। विभाजन के बाद तो ये अन्तराष्ट्रीय बॉर्डर में तब्दील हो गया। 1965 और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध जैसलमेर की महत्ता और बढ़ गयी। एक और समस्या थी पानी की किल्लत की, तो वो भी इंदिरा गांधी केनाल ने हल करदी।
     जैसलमेर किल्ला:- पूरा किल्ला तीन परतो में लिपटा हुआ है। किल्ले की स्थापना त्रिकुटी हिल पे की गयी है। प्रवेशदार बहुत बड़ा है। किल्ले के अंदर दुकाने, घर रेस्टोरेंट, बुकस्टाल और ब्यूटी पारलर भी मौजूद है। किल्ले के बिच चौगान पे  महाराजा का सात मंजिला महल है, जो अभी म्यूजियम में तब्दील हो चूका है। यहां आप दीवाने खास, जो की महल के पूर्व बाजु है यह इतना ऊपर है की यहाँ से पूरा शहर का नजारा दीखता है, को देख सकते हो| ऊपर की तरफ दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए  बड़े पत्थर का जत्था लगा हुआ हैै। तो दीवाने आम पूरा पोर्सलीन टाइल्स से बनाया गया है।
     जैन मंदिर:-श्री रुषभदेवजी, श्री चन्द्रप्रभुजी, श्री पाश्र्वनाथजी, श्री शान्तिनाथजी, श्री संभावनाथजी और श्री कुन्तुनाथजी ये सब जैन तीर्थंकर है जिनके मंदिर किल्ले के अंदर आये हुए है।  श्री चंद्रप्रभुजी का मन्दिर 1509 ईस्वी में बनाया गया था। बनाने में कोई सीमेंट या रैत का इस्तेमाल नही हुआ है बलकी लोहे के इस्तेमाल से  ब्लाक को जोड़ा गया है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रीचंद्रप्रभुजी की चार कृतियां रखी गयी है। यहाँ पे मूर्तियों के मण्डप देखने लायक है। श्री शितलनाथजी का मन्दिर दरवाजे के दक्षिणी छोर पे है। आठ कीमती धातुओ से इस मन्दिर की स्थापना की गयी है। यहाँ से सिडीयाँ सीधी ज्ञानभन्डार को जाती है। इसकी स्थापना 1500 ईस्वी में आचार्य महाराज जिन भद्रसूरिजी ने की थी। ये भूमिगत भाग में कीमती पांडुलिपियां, ज्योतिषी नक़्शे रखे हुए है। कई सारे कीमती पत्थर और हाथी दांत से बनी श्री पार्श्वनाथजी की मूर्ति रखी गयी है। कई जैन साधुओं की पवित्र चीज़े रखी गयी है
      पुस्तकालय के निचे श्री शान्तिनाथजी और श्री कुंथु नाथजी के मन्दिर आये हुए है। दोनों की कलाकारिगरि अद्भुत है। संलग्न गैलेरी जो श्री शान्तिनाथजी के इर्दगिर्द आई हुई है वहां कई सारे साधुओकी  मूर्तियां रखी हुई  है। ये मुर्तिया मार्बल और जैसलमेर सैंडस्टोन दोनों से बनी है। बाद में किल्ले के मध्य में लक्ष्मीनाथ और सूर्य मन्दिर आये हुए है।
     हवेलीयां:- जैसमलेर के जैन व्यपरिओने इनकी स्थापना की। शेखावाती हवेली के अलावा इतनी अदभुत कारीगरी आपको कही देखने को नहीं मिलेगी। इसमें पहली है कोठारी पटवों की हवेली। ये पांच विभागों में विभाजित है। इसका निर्माण 1800 से 1860 ईसवी के बीच पांच जैन भाइयों ने किया था। इन पांचो मे कोठारिस पटवों की हवेली के नाम से।म्यूजियम बना हुआ है।  म्यूजियम में पगड़ियाँ, घर का सामान, पुराना टेलीफोन और ग्रामोफ़ोन जैसी अनेक चीज़े यहाँ रखी गयी है। अब ये म्यूजियम वाला भाग मुम्बई स्थित कोठारीओ ने ले लिया है।
     सलिमसिंग की हवेली:- एक क्रूर मंत्री के रूप में विख्यात यह हवेली खुद सलिमसिंग की है। इनका निर्माण 1815 में हुआ था।  यह कलकारिगिरि का अदभुत नगीना है। निचे से एकदम संकरी मगर ऊपर जाते ही एक अचंभित टर्न ले के छत wider होती जाती है।मेंहैहवेली की रचना लोहे द्वारा  पत्थरो को जोड़ा गया है। इसमें सीमेंट का उपयोग ज़रा भी नही हुआ।  इस हवेली की हर एक बालकनी (38) में अलग अलग निर्मित है। 
      हवेली और  सलीम सिंग की कहानी में विरोधाभास है। सलीम सिंग राजा का मंत्री हुआ करता था। कुलधारा गाऊ सलीम सिंग की बदौलत ही खाली हुआ। उसने पालीवाल जाती पर जरूरत से ज्यादा कर लगाया उनको लूटा गया। यह मंत्री किसीको नही छोड़ता था, और शाहूकार के कर द्वारा सब को अपनी ज़ंजीरो में जकड़ लेता था। गाऊवालो की शिकायतों को भी उनसुना कर दिया। तो तंग आकर गाउवालो ने पलायन शुरू किया। इसमें से एक गाऊ कुलधारा भी था। कहते है की 84 गाऊ निर्वासित हुए। जब सलिम सिंग की क्रूरता तमाम हद पार कर गयी, तो जैसे को तैसा उसी न्याय से सलीम सिंग की हत्या कर दी गई।
     नथमल की हवेली:- इस हवेली का निर्माण 19मी सदी के आखिर में हुआ था। इसके पहले माले पे 1.5 गोल्ड से बने चित्र रखे हुए है। हवेली के दोनों साइड दो भाईओने हाथु और लालु ने अपनी कारीगरी दिखाई है। ख़ास बात ये है की दोनों साइड एक दूसरे जैसी लगती है मगर एक जैसी है नहीँ।
     गड़ी सागर- गड़ी सागर एक हौज है, जो शहर को पानी सप्लाई करता था। इसकी स्थापना ईस्वी 1367 में महाराजा गड़ी सिंग ने की थी। एक जमाने मे यह जैसलमेर का एक मात्र जलस्त्रोत था। यहा धामधुम से गणगौर त्योहार मनाया जाता है।
    टीलों की पोल - एक 
        

Wednesday, 13 April 2016

ढाई जौहर जैसलमेर के

          ईस्वी 1156 में रावल जैसल ने त्रिकुटा पर्वत पे जैसलमेर राज्य की स्थापना की। रावल उपाधि का मतलब है की राजघराने वाला। इसी त्रिकुटा पर्वत पे एसुल नामक साधू का निवासस्थान था। जब रावल जैसल उनसे मिलने आए तो साधू,  ने उनसे उनके वंश के बारे में पूछा। रावल ने अपना नाता यदुवंश से बताया तो साधू ने विस्तार से त्रिकुटा पर्वत और उसके बारे में जुडी हुई पौराणिक कहानी बताई।
          पौराणिक कहानी के अनुसार जब इस पर्वत पे श्रीकृष्ण ने भीम के सामने ये भविष्यवाणी की थी की त्रिकुटा पर्वत पे जो भी नगर बसाया जायेगा उस नगर का राजा यदुवंशी होगा। उस पौराणिक कहानी राजा को कहे जाने के पश्चात साधू ने भी एक भविष्यवाणी की जिसके मुताबिक़ यह राज्य ढाई बार बसके उजड़ जायेगा और फिर बसेगा। इस भविष्यवाणी को सुनने के पश्चात् भी राजा इसी बात पे कायम रहा की किल्ला तो इसी पर्वत पे बनाना है।
          जैसलमेर पहले से ही एक महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग हुआ करता था। उत्तर भारत एवं मध्य एशिया को गुजरात के अरबी समुद्र से फिर वहां से ईरान और इजिप्त तक जोड़ता था। इसी महत्वपूर्ण जगह की वजह से हर एक गुजरते हुए काफिले के पास से टैक्स लिया जाता था। भाटी राजपूतो की जोधपुर एवं बीकानेर के राठोडो से कई बार झड़पें होती थी इसी वजह से होती थी
          उस समय ख़िलजी, जो एक तुर्क मुसलमान था, का शासन दिल्ही पे हुआ करता था। उनके पुरे काफिले पर जैसलमर से छापा मारा गया। इस खबर से तिलमिला उठे ख़िलजी ने ताबड़तोड़ सैन्य ले के जैसलमेर जाने का फैसला किया। किल्ले में भी युद्ध की पूरी सम्भावना देखते हुए जोरदार तैयारियां चल रही थी। सब बूढ़े, बच्चे और बीमार लोगो को सैन्य की देखरेख में सुरक्षित स्थान पर हटा दिया गया। किल्ले को चौतरफा सुरक्षित कर और अनाज तथा गोलाबारूद के भंडार भर के रावल जैतसिंह राह देखने लगा।
         एक मान्यता अनुसार यह युद्ध आठ साल चला जिसमे रावल के सैनिको ने शत्रु की सप्लाई चैन काट दी। चडाई के दौरान रावल जैतसिंह की मौत हुई और उनका पुत्र मूलराज दूसरा गद्दी पे आसीन हुआ। ईस्वी 1294 में शत्रु को एक बड़ी सफलता तब हाथ लगी जब  शत्रुओ ने किल्ले की पूरी घेराबंदी कर ली। अब धीरे धीरे किल्ले का खाना और बारूद खत्म होने लगा।  भाटिओ को लगा की हार निश्चित है, तो 24000 स्त्रियों ने जौहर शूरू किया। एक चिता तैयार की और अपने आपको उसके हवाले कर दिया। जब वो चिता भी छोटी पड़ी तो बची हुई स्त्रियों ने अपने सगे सम्बधियों की तलवारो द्वारा कटना मंजूर किया। हार निश्चित थी इसलिए पुरुषो ने किल्ले के द्वार खोल दिए और दुश्मनो को जितना हो सके उतना मार के वीरगति प्राप्त की।  ये था पहला जौहर
          14वि सदी में दिल्ही का राजा तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह था। जैसलमेर के युवा राजा  अजमेर के पास आये आनासागर तालाब के किनारे लगाये हुए राजा के तम्बू पे छापा मारा, और उनकी कीमती घोडा ले गया। तुग़लक़ ने किल्ले पे चढ़ाई की और इस दूसरे जौहर में 16000 स्त्रियां एवं 1700 जवामर्द विरयोद्धा के साथ रावल दूदू और उनका पुत्र तिलासकी मारा गया।
         आमिर अली नामक एक अफगानी सरदार था। उसने रावल लूणाकरण के विरुद्ध दांव खेला।उसे कहलवाया की आमिर अली यानि अपनी खुद की पत्नी जैसलमेर की रानी से मिलने लालायित है तो रावल ने मंजूरी दे दी। पूरी पालखी सज गयी, और पालखी जैसे ही किल्ले के दरवाजे के अंदर पहुची, दरवान भौचक्के रह गए। वो और रावल दोनों मुर्ख बने क्योंकि पालखियों में अफगानी स्त्रियों की जगह आमिर अली के अफगानी लडाकू थे। धौखे से हुए हमले में राजा चौकन्ना नहीं था,  और बाजी हाथ से जा रही थी। और तो और वक़्त इतना कम था की चिताएँ भी तैयार करना नामुमकिन था। स्त्रियां दुश्मन के शिकंजे में न आये इसीलिये रावल ने अपनी तलवार म्यान में से निकाली और एक के बाद एक स्त्रियों को मारता चला गया। आश्चर्यजनक तरीके से आधा जौहर पूरा होते ही बाहर से मदद आई, और आमिर अली को पकड़ के उसे तोप के मुह के पास लटका दिया गया।  बूम, एक ही धमाके ने उसके फुर्चे फुर्चे उड़ा दिए गए। ये आधा जौहर था क्योंकि जैसे ही बाहर से रावल को मदद आई वैसे ही चिता पे चढे लोगो को उतार लिया गया।
          अब देखने की बात ये है की बिकानेर और जोधपुर के राठौड़ अविरत जैसलमेर के रावलो से लड़ते थे।क्या ऐसी संकटपूर्ण घडी में इन राजाओ द्वारा अपने पुराने वैर या गीले शिकवे भूल के एक दूसरे की मदद नहीं करनी चाहिए?  क्या इसका दायित्व श्री छत्रपति महाराज शिवाजी और महाराणा प्रताप ने ही ले रखा है? इस लेख को लिखते वक़्त मन में उस दौर के कई राजा और इस दौर के कई राजनेताओ पे मनोमंथन करा जो अपने आप को हिन्दू सम्राट तो कहलाते है, मगर क्या कभी अपनी इसी बात पे कायम रहते है? खैर राजा गए मगर वोट की चाह वाले  राजनेताओ के लिए तो आनेवाला वक़्त ही मिल का पत्थर साबित होगा की वोट के दौड़ में वो कहा तक निकल गए है।
         

Saturday, 26 March 2016

सीतामढ़ी एक अद्भुत जगह

पौराणिक कथा अनुसार लंकाधिपति रावण की क्रूरता तब हद पार कर गयी जब उसने अपने यहाँ बसे हुए ऋषिमुनिओ से कर के एवज में रक्त लेना शुरू किया। इस अनाचार के बदले क्रुद्ध ऋषिमुनिओ ने उसे श्राप दिया की "जिस दिन रक्त से भरा कलश का मुह खुलेगा,  है रावण उस दिन तुम्हारा विनाश होगा"। अब रावण इस श्राप से डर गया तो उसने वह कलश सीधा राजा जनक के खेत में गड़वा दिया।
     एक बार जनकराजा के राज्य जनकपुर में भीसण अकाल पड़ा। ऋषिमुनियों की सलाह मानक जनकराजा ने खेत में हल चलाया। हल सिधा कलश से जा टकराया। कलश का मुह तुरन्त खुल गया और सीताजी का आविर्भाव हुआ। इसलिए इस जगह का नाम सीतामढ़ी रखा गया है। इसके बाद की कथा तो सबको पता ही है।
     जनकराजा ने खेत में हल चलाने से पहले पुत्रेष्टियज्ञ किया था। जिस स्थान पे ये यज्ञ हुआ था अभी उसको हलेश्वर के नाम से जाना जाता है। यहाँ पे अभी प्राचीन शिवमंदिर अवस्थित है। सीतामढ़ी से इसकी दुरी है 30 किलोमीटर।
     जनकपुर से लौटते समय सीताजी की डोली एक वटवृक्ष के निचे रखी गयी थी। वो वटवृक्ष आज भी मौजूद है, और इस जगह को पंथपाकड़ के नाम से जाना जाता है।  और भी अन्य देखने लायक जगह जैसे. सूर्यमंदिर, वैष्णवदेवी का मंदिर, और सीताउद्यान।
     सीतामढ़ी से 3 किलोमीटर दूर  भव्य सरोवर एवं मन्दिर है। सरोवर को जानकी जन्मकुंड और मन्दिर को जानकी जन्मभूमि कहते है। मन्दिर में सीता-राम और लक्ष्मण की प्रतिमाये है। एक मेला भी सीतानवमी के अवसर पर लगता है। सीता, राम और लक्ष्मण की प्रतिमाए यहाँ श्याम रंग की है, और मंदिर का हार चांदी से बना हुआ है।
    
    

Tuesday, 15 March 2016

मेरा पहला पत्र

शिवरात्रि जूनागढ़ में।
       

भवनाथ मंदिर का इतिहास और वहा पे स्थापित शिवलिंग काफी पुराना है। कहते है की शिवलिंग के पीछे एक तालाब बना हुआ है जिसकी  स्थापना 1880 में की गयी थी। स्कंद्पुरण में भवनाथ मंदिर की पूरी कहानी वर्णित है। शिवलिंग के ऊपर कई बारीक़  रुद्राक्ष के पारे पे दाने लगे हुए है, बारीकी से देखने पे पता चलता है की सारे दानो के ऊपर ॐ वर्णित है
          मंदिर सवर्णरेखा नदी के बिच में और मृगिकुण्ड के किनारे आया हुआ है। स्पष्ट उल्लेख नहीं है मगर मंदिर भूतकाल में अवस्य जहोजलाली से भरपूर रहा होगा। जब मंदिर का जीणोद्धार चल रहा था तब 8 या 10 फीट निचे से सुन्दर, भव्य और महीन बारीक़ कला वाले शिलालेख मिले थे। मंदिर कैसे ध्वस्त हुआ उसका भी कोई उल्लेख नहीं मिल रहा है।
          भवनाथ मंदिर के बारें में इतना लिखने का मेरा तात्पर्य जूनागढ़ के प्रसिद्द और हर साल मनाएं जानेवालें शिवरात्रि के मेले से हैं। मेले की शुरुआत महावद तेरस के दिन भवनाथ मंदिर पे धजा चढ़ा के की जाती है। विशाल जगह में ये मेला आयोजित किया जाता है, भक्ति,भोजन और भजन इसमें और रंग भर देते है।
          यहाँ का प्रमुख आकर्षण साधू संत एवं नागा साधू के जुलुस है। इस जुलुस को गुजराती में रवेडी भी कहा जाता है।  शिवरात्रि के दिन निर्धारित समय पे दसनामि पंथ के अखाड़े से साधुबाबा सबसे पहले रवेडी या जुलुस निकालते है। इनमे पहली पालखी भगवान् दतात्रेय की होती है,और बाद में कई साधू संत एवं उनके शिष्य अपनी अपनी धर्मधजा और धर्मदंड ले कें बारी बारी जुलुस में शामिल होतें है। लोगबाग का हुजूम पहले से ये देखने के लिए रास्तें के दोनों छोर पे उमट पड़ता है।
          जुलुस में कए कसरत के दावपेच, लाठिदाव,तलवार दाव और दुसरे अनेक नानाविध एवं हैरतअंगेज प्रकार के प्रयोग किये जातें है। पूरा जुलुस भवनाथ मंदिर के दुसरे दरवाजे से प्रवेश करता हुआ मृगिकुण्ड पहुचता है। नियत क्रम अनुसार नागाबाबा और साधू संत मृगीकुण्ड में स्नान करतें हे और बादमे भवनाथ मंदिर के दर्शन एवं आरती पूजा करतें है।
          भगवान भोलेनाथ की आरती के बाद पूरा वातावरण हर हर महादेव के नादो से गूंज उठता है। ऐसी भी लोकमान्यता है की अस्वस्थामा, गोपीचंद, बलिराजा, परशुराम, राजा भरथरी, विभिषण जैसे कई महापुरुष इस पवित्र दिन पे स्नानविधि के लिए मृगीकुन्ड आतें है।
          मेले का आयोजन भी बहुत ही अच्छी तरीके से किया जाता है। भंडारा के अलावा कई बसें भी मेले तक ले जाने के लिएें दौडाई जाती है। यात्रीको की सेवा के लिए चौबीसों घंटे माहिती केंद्र भी उपलब्ध भी रहता है।
          भवनाथ मंदिर-: पृथ्वी पे हुए प्रलय के बाद की सुबह में ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र तीन रूप में प्रकट हुए, सत्व, रजस् और तमसे। अब इन तीन भगवान में कौन बड़ा है इसकी बहस छीड गयी। शिवजी तब मध्यस्थि हुए और ब्रह्मा को उत्पत्ति, विष्णुजी को देखरेख और लालनपालन और रूद्र को संहार का जिम्मा सोपा। इस तरह जघड़े का अंत किया। ब्रह्माजी ने शिवजी से संसार में रहकर संसारियों के सुख दुःख मिटाने की गुजारिश की। शिवजी ने इसके लिए उचित जगह पे नज़र दौड़ाई और गिरनार को ढूंढा।
      पार्वतीजी ने देखा की शिवजी कैलाश पर्वत पे नहीं है। उन्होंने जाना की सारे देवताओ ने मिलके शिवजी को सृष्टि पे भेज है तो वह भी गिरनार आ पहुचे। उस दिन शिवजी भवनाथ रुप में थे और दिन था वैसाख सूद पूनम का। पार्वतीजी गिरनार पे अम्बिका रूप में, विष्णुजी दामोदर रूप से दामोदर कुण्ड में और अन्य देवताओंने अलग अलग रूप से गिरनार में स्थापित हुए। भवनाथ मंदिर की स्थापना का ये इतिहास है।
          मृगिकुण्ड का भी ऐसा ही इतिहास है राजा भोज जो कान्यकुब्ज के राजा थे। एक दिन उनके सेवक ने आके एक स्त्री के बारें में जानकारी दी जिनका मुख हिरन का और शरीर स्त्री का था। राजा काफी मेहनत बाद उसको महल में लाएं। कोई भी विद्धवान इस पहेली का उकेल नहीं ला पाए तो राजा भोज उध्वरेता नामक ऋषि के पास गएं।
            उध्वरेता ऋषि ने मृगमुखी को वाचा दी। तब मृगमुखी ने अपने अगले जन्म की कहानी बताई। उसके मुताबिक़ मृगमुखी हिरन थी और राजा भोज  शेर (लायन) थे। राजा ने हिरन यानि मृगमुखी का शिकार किया तब भागते वक़्त उसका मस्तक जाडी में फस गया।
          बाकि का शरीर सुवर्णनदी में गिरा। नदी के पवित्र पानी में गिरने से मृग ने मानवशरीर धारण किया मगर मुख जाडी में फसे हुए होने की वजह से हिरणी का ही रहा। राजा भोज ने जाडी में से खोपरी या मुख ढूंढ़ निकाला और वापिस  सुवर्णनदी में प्रवाहित किया। नदी के पवित्र पानी में प्रवाहित करते ही मृगमुखी का पूरा शरीर औरत का बन गया।
          राजा भोज ने बाद में उसके साथ विवाह किया और रेवताचल (गिरनार)  में एक कुण्ड बनाया। इसी कुण्ड को  आज मृगिकुण्ड कहते है। इसी कुण्ड में शिवरात्रि के दिन साधू स्नान के लिए आते है।