Saturday, 20 August 2016

तनोट माता टेम्पल, शत शत नमन

राजस्थान का जैसलमेर जिल्ला पाकिस्तान बॉर्डर की नजदीक होने की वजह से सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण चौकियों में से एक है। जैसलमेर के भाटी राजपूत तणुराव ने तनोट को अपनी राजधानी सम्वत 828 तनोटराय की मूर्ति स्थापित करक बनाया। बाद के भाटी राजपूतो ने अपनी राजधानी जैसलमेर में स्थापित की, पर मंदिर तो तनोट में ही रहा।
मामड़िया नामक एक चारण निसंतान था, और संतान प्राप्ति के लिए उनहोंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की। माता चारण के स्वपन में आई और इच्छा पूछी। माता उनके यहाँ जन्म ले ऐसी इच्छा चारण ने जताई।
      माता की कृपा से चारण के यहाँ सात पुत्री और एक पुत्र हुआ। उन्ही सात पुत्रीओ में से,  विक्रम संवत 808 में, पुत्री आवड ने चारण के वहा जन्म लिया। सातों पुत्रियां दैवीय चमत्कारो से युक्त थी। हूणों से इन्होंने ही माड़ प्रदेश की रक्षा की। राजपूतो का राज्य माताजी की कृपा से सुदृढ़ हो गया तो राजा तणुराव भाटी ने इसे अपनी राजधानी बनाया।  विक्रम संवत 828 में आवड माता अपने भौतिक शरीर के साथ यहाँ स्थापित हुए। विक्रम संवत 999 में सात बहनो ने महत्वपूर्ण व्यक्ति और माड़ प्रदेश के अन्य लोगो से कहा की हमारा अवतार लेने का उदेश्य पूरा हुआ है। उसके बाद सभी बहने पश्चिम में हिंगलाज माता की और देखते हुए अदृश्य हो गई।
तनोट सामरिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है। सन् 1965 में यह क्षेत्र तीनो क्षेत्रो से घिर चूका था। एक बार शत्रु का कब्जा तनोट पे होते ही रामगढ़ से शाहगढ़ का पूरा क्षेत्र उनके हाथो में आ जाता। तनोट पर भारी बमबारी 17 और 19 नवंबर को हुई। बमबारी के साथ साथ तोप के गोले भी दागे गए। ऐसे में 13वि ग्रेनेडियर्स के मेजर जयसिंह और सिमा सुरक्षा बल की दो कंपनियो के हाथो कमान सोंपी गई।
घंटाली माता के मंदिर के पास शत्रु ने एंटी पर्सनल और एंटी टैंक माइंस लगाकर तनोट जानेवाली सप्लाई को रोक दिया। शत्रु के भरी गोलाबारी और बमबारी के बावजूद (लगभग कुल 3000 बम, और अकेले मंदिर को निशाना बनाया 450 गोलों ने) एक  भी गोला मन्दिर को निशाना नहीं बना सका। सभी गोले मंदिर के आसपास गिर गए और फूटे तक नहीं। इस याद में मन्दिर मंदिर के परिसर में एक छोटा सा म्यूजियम भी है जिसमे पाकिस्तानी सेना द्वारा फैके गए बम है जो फूटे नहीं। इस बनाव ने हमारे जवानो की हिम्मत और बढ़ाई। कम संख्या में होने के बावजूद सैनिको ने पुरे दम से शत्रुओं को भागने पर मजबूर किया।
सन् 1971 की 4थी दिसंबर की रात को BSF और पंजाब रेजिमेंट की एक कंपनी ने विश्व की महान लड़ाइयो में से एक लोंगेवाला की लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी टैंको को नेस्तोनाबूद कर दिया, और मंजर ऐसा था जैसे पाकिस्तानी टैंकों की वहा कब्रे खोद दी हो। माँ के आशीर्वाद और जवानो की हिम्मत से ये सब मुमकिन हुआ।
पहले माता की पूजा साकल दीपी ब्राह्मण किया करते थे, 1965 से माता की पूजा BSF द्वारा नियुक्त पुजारी करते है और मन्दिर का प्रबंधन BSF रेजिमेंट के ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। लोंगेवाला की विजय के बाद तनोटराय के परीसर में एक विजयस्तम्भ का निर्माण हुआ है, जहा हर साल 16 दिसंबर को वीर सैनिको की याद में उत्सव मनाया जाता है। हर साल आश्विन और चैत्र नवरात्र में यहां विशाल मैले का भी आयोजन होता है।
DISTANCE
जैसलमेर- 80 किलोमीटर- रामगढ़
रामगढ़- 40 किलोमीटर- तनोट
तनोट- 15किलोमीटर- BP609
तनोट- 38किलोमीटर- लोंगेवाला
लोंगेवाला- 45किलोमीटर- रामगढ़
रामगढ़- 80किलोमीटर- जैसलमेर।
ये तब की बात है जब हैं जैसलमेर की मेँन चेकपोस्ट पे थे। दरअसल हमें परमिशन वहा जाने की बमुश्किल मिली। हमरा ड्राईवर लोकल बाशिंदा था। और सबसे बॉर्डर पर हमारे जवानो से मिलते समय कहा कट गया पता नहीं चला। उनके मैं ऑफिसर से भी मिले जिन्होंने बड़े आदर सत्कार के साथ चाय नाश्ते का पूछा और थोड़े डिस्कशन के बाद हमने वहा से टेंट पर जाने के लिए प्रस्थान किया। अब रात के 8 बज चुके थे, और बोडर् से लेके टेंट का इलाका एकदम सुमशां। लगभग डिस्टस था,

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