मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर
अहमदाबाद से मेहसाना काम के सिलसिले में जाना हुआ। वैसे ग्रुप से ही मुझे घुमक्कडी का चसका लगा है, तो भाई के सामने ये शर्त रखी की वहा से मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर देखना ही देखना है। थोड़ी आनाकानी के बाद ये शर्त भी मंजूर हुई। जहा पे जाना था वहा से मन्दिर की दुरी 25 km है, पर रास्ता बहोत ही बढ़िया है। दोनों साइड वृक्षो से आच्छादित रोड इस चिलचिलाती धुप में शुकुन देते है। दोपहर को 3 बजे 46 डिग्री की धुप में हम सूर्यमन्दिर के दर्शन करने पहुचें। वापिस आने में दैर होने ही होनी थी इसलिए मंदिर की प्रदक्षिणा हमने (मैंने और मेरे कज़िन ने) 15 मिनट में पूरी की। इसी कस्मोकश में म्यूजियम देखना छुट गया।
अब गाथा सूर्यमन्दिर की,
सोलंकियुग गुजरात के इतिहास का सुवर्णयुग कहलाता है। सांस्कृतिक विरासत, स्थापत्यकला, जाजरमान प्रतिभा सब इसी युग में स्थापित हुई। अंहिलपुर पाटन के सोलंकी राजवी भीमदेव पहले के समय में ख्यातनाम सूर्यमन्दिर मोढ़ेरा का निर्माण इ.स. 1027 में शुरू हुआ। यह मंदिर गुजरात में मेहसाना जिले के चानस्मा तालुका के मोढ़ेरा गाऊ में आया हुआ है।
सूर्यपूजा भारतभर में सालो से चली आ रही अविरत प्रक्रिया है। यूँ कहे की ये जीवन का अभिन्न अंग है। यह हमारी प्रकृति के साथ प्रेम की अभिव्यक्ति है। इसी सूर्यपूजा के साथ साथ सूर्यमूर्ति और सूर्यमन्दिर के निर्माण की प्रणाली भी अस्तित्व में आयी। ईरान के शक लोगों ने सौराष्ट्र पे हमला किया। शक लोग सूर्य और अग्निपूजक थे तो हो सकता है की इन्होंने ही भारत में सूर्य और अग्नि की पूजा शूरू करवाई हो। वल्लभी वंश के कई राजा ने सूर्यधर्म को राजधर्म घोषित किया था। उसी समय कई लकड़ी के सूर्यमन्दिर बने थे पर समय के सामने ये लकड़ी के मंदिर टिक न सके।
सूर्यपूजा का सम्बन्ध इस पुराणकथा से जुडा हुआ है। हुआ युं की संज्ञा, जो भगवान विश्वकर्मा की बेटी थी, उनका विवाह सूर्य के साथ तय हुआ। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर सकी और वो वापिस अपने घर आ गयी। इसी बात पे भगवान विश्वकर्मा ने उन्हें डांट लगायी, और कहा की यह भूल अक्षम्य है। संज्ञा को आदेश दिया की तुम्हे धर्मारण्य जा के तप करना पड़ेगा। संज्ञा की तप की शुरुआत के साथ एक अध्याय का अंत होता है।
दूसरे अध्याय में सूर्य अपना जीवन छाया के साथ शूरू करते है। एक दिन भगवान विश्वकर्मा से मिलने सूर्य उनके घर जाते है। तभी उन्हें संज्ञा के बारें में ज्ञात होता है। सूर्य तुरंत संज्ञा से मिलने घोड़े का रूप लेके धर्मारण्य पहुचते है, तो संज्ञा भी उन्हें देख के तुरंत पहचान जाती है। अब तप के प्रभाव से संज्ञा ने भी घोड़ी का स्वरुप ले लिया, और इसी धर्मारण्य में दोनों बरसो तक रहें। यहां उन्हें तीन संतानो, यमधर्म, यमुनाजी, और अश्विनी कुमार, की प्राप्ति हुई। बाद में इसी जगह (जिस जगह संज्ञा और सूर्यजी रहे) सूर्यमंदिर की स्थापना हुई।
राजा भीमदेव ने पुराने लकड़ी के मन्दिर की जगह नया और वर्तमान इतिहासप्रसिद्द मोढ़ेरा के सूर्यमन्दिर का निर्माण किया। जानके आश्चर्य होगा पर ये बात सही है की कोणार्क का भव्य सूर्यमन्दिर मोढ़ेरा के सूर्यमन्दिर के लगभग ढाइसो से तीनसो साल बाद बना। हाँ, कलाकारिगरी और डिज़ाइन के मामले में दोनों एकदम अलग है।
मोढ़ेरा का सूर्यमन्दिर 51 फुट और 9 इंच लम्बाइ तथा 25 फुट और 8 इंच चौड़ाई में फेला हुआ है। इस मन्दिर को तीन भागो में बांटा गया है, जो निम्नलिखित है। 1 गर्भगृह, 2 अंतराल, 3 सभामण्डप। मन्दिर के आगे एक बड़ा सा कुण्ड है, जिसे रामकुण्ड या सूर्यकुण्ड भी कहते है। इस कुण्ड में उतरते समय कई छोटे छोटे मन्दिर, जिनकी संख्या 108 है, आये हुए है।
इसी छोटे छोटे मन्दिरों में वैष्णव मूर्ति की तादाद ज्यादा है। कुण्ड के पूर्व बाजु और मुख्य मन्दिर के सामने शेषशायी विष्णु की मूर्ति है। दूसरी मुर्तिया में वामन अवतार, शितलादेवी और कमलआसन पर बेठे हुए लक्ष्मीजी की मुर्तिया है। ऐसा कहा जाता है की सूर्य के घोड़े द्वारा खुजाने से ये कुण्ड अस्तित्व में आये है।
सूर्यमन्दिर एक ऊँचे आसन पे बिराजमान है। उत्तर तरफ की दीवार में एक बड़ी सी मूर्ति रखी हुई है। इस मूर्ति के तीन मुख तीन पैर और तीन हाथ है। गाऊ के लोग इसे कालभैरव कहते है और हर सप्ताह तैल और सिंदूर का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। मूर्ति के आगे नंदी शिव के साथ खड़े है।
सूर्यमन्दिर का मुख पूर्व दिशा में है, इसलिए वसन्त और शरद ऋतु में सूरज की किरने पुरे सभा मण्डप को पार करके गर्भगृह में गिरती है, जिससे सभामण्डप की मुर्तिया, खम्भे सब एक साथ देदीप्यमान होते है। ई.स. 1809 में सर्वेयर जनरल मोनियर विलियम ने जब यह मन्दिर पहली बार देखा तो वो अचंभित रह गए थे। मोढ़ेरा गाऊ सूर्यमन्दिर एवं प्राचीन मातंगी मन्दिर के लिए भी प्रसिद्द है। लोकहृदय में मातंगी मन्दिर मोढेश्वरी माता के नाम से भी प्रसिद्ध है।
कैसे पहुचा जाए।
1. अहमदाबाद से मेहसाना और मोढ़ेरा के लिए स्पेशल बसें जाती है। आप को अहमदाबाद से शेयर टैक्सी भी मिल जायेगी, या तो फिर शेयर जीप भी। हालांकि जीप में आदमी बहुत भरे जाते है।
2. खाने पिने के लिए मन्दिर के पास ही तोरण करके eateries की शॉप है जहाँ से आपको mrp प्राइस पे ही कोल्ड ड्रिंक्स एवं नास्ते मिल जायेंगे। शायद पास ही में तोरण गेस्ट हाउस भी है। दोनों गवर्नमेंट की देखरेख में चलते है।
3. सूर्यमन्दिर के लिए एंट्री टिकट 15 RS है।
4. अगर हो सके तो ठण्ड की ऋतु में जाए। अगर भूल से भी समर में निकले हो तो यहां शाम को आना पसंद कीजिये। मंदिर के आगे लॉन एकदम व्यवस्थित है, और पिकनिक के लिए उत्तम जगह है।
5. हर साल के फेब्रुअरी महीने में यहां नृत्य महोत्सव का आयोजन गुजरात सरकार द्वारा किया जाता है। देश के दिग्गज नृत्यकार यहाँ भाग लेने आते है।









No comments:
Post a Comment